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विद्या भारती, पूर्वी उ0प्र0
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वसुधैव कुटुंबकम् का भाव ही वैश्विक शांति की गारंटी – डा.सौरभ मालवीय
संस्कृति और संस्कार भारतीय सभ्यता के मानबिन्दु हैं जिन्हें अपना कर ही भारत विश्व गुरु रहा है और पुनः विश्वगुरु बनेगा। कर्मनिष्ठा,, विनम्रता और परहित सरस धरम नहिं भाई के ध्येय पर ही भारतीय सभ्यता की विशिष्ट पहचान बनी है और अखिल भारतीय शिक्षण संस्थान के रूप में काम करते हुए विद्या भारती का यह परम लक्ष्य है कि शिक्षा संस्कार युक्त हो,और उसको मिलने वाली शिक्षा उसे भारतीय सभ्यता और संस्कृति से ओतप्रोत बनाए। उक्त बातें नर्वदेश्वर सिंह सरस्वती वरिष्ठ माध्यमिक विद्या मंदिर देवरिया खास देवरिया के माधव सभागार में आयोजित लक्ष्य बोध कार्यक्रम मे मुख्य अतिथि के रूप में छात्रों को संबोधित करते हुए डा. सौरभ मालवीय ने कही। लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता व जनसंचार विभाग के विभागाध्यक्ष और विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश के मंत्री डा. सौरभ मालवीय जी ने आज छात्रों को संबोधित अपने उद्बोधन में बहुत सहजता से उन्हें कर्तव्य बोध कराते हुए कहा कि जीवन में लक्ष्य होना शरीर के प्राणवायु के होने के समान है। लक्ष्य विहीन मनुष्य पशु जैसा है, इसलिए प्रत्येक के पास एक सपना होना चाहिए, प्रत्येक के पास अपना लक्ष्य होना जरूरी है।जैसा कि प्रातः स्मरणीय अब्दुल कलाम जी कहते हैं,सपने वो हैं जो हमें सोने नहीं देते,इस लिए स्वामी विवेकानंद जी के ध्येय वाक्य को हमेशा याद रखें कि उठो जागो और तब तक नहीं रुको जब तक कि लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।
आपके लिए जीवन में सफल होना न केवल आपकी सफलता है बल्कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति से युक्त सफल जीवन पुरे राष्ट्र को अपनी सुंगध से सुरभित करता है।ऐसे ही व्यक्तित्व का निर्णय विद्या भारती का परम लक्ष्य है।जब आप सफल हों,आपकी सफलता से समाज का अंतिम व्यक्ति भी लाभान्वित हो,ऐसी ही शिक्षा आज पुरे विश्व को शांति प्रदान कर सकती है क्योंकि भारतीय संस्कृति में बसुधैव कुटुंबकम् का जो उद्घोष है, वही वैश्विक शांति एकमात्र गारंटी है। रामराज्य के आदर्श को बहुत सहजता से रखते हुए मुख्य अतिथि जी ने कहा कि विश्व इतिहास में राजतंत्र की संकल्पना मानवीय गरिमा और स्वतंत्र चेतना के विपरीत भाव के रूप में दर्ज है लेकिन भारतीय संस्कृति के परम वैभव को दर्शाती रामराज्य की संकल्पना आज भी पुरे विश्व के लिए प्रासंगिक है।जिस व्यवस्था में दैहिक दैविक भौतिक अर्थात शारीरिक, आर्थिक,और मानसिक किसी भी प्रकार का संताप किसी को नहीं हो।ऐसी व्यवस्था भारतीय संस्कृति में संभव है,और यह संकल्पना आप सभी छात्रों की सफलता और सभ्यताजनित व्यक्तित्व से ही साकार हो सकती है।
अतिथि परिचय प्रस्तुत करते हुए विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री अनिरुद्ध सिंह जी ने देवभूमि देवरिया की मेधा मनीषी श्रृंखला में एक कड़ी के रुप में शामिल डा.सौरभ मालवीय जी के जीवन और कृतित्व को छात्रों के लिए प्रेरणा स्रोत बताया। कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि जी द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया।
इसके पश्चात पूर्व छात्रों की एक बैठक का आयोजन पुरातन छात्र परिषद के तत्वावधान में हुआ। जिसमें सरस्वती विद्या मंदिर देवरिया के पूर्व छात्रों ने प्रतिभाग किया। विभिन्न व्यवसायों,व प्रशासनिक, सेवाओं में लगे पुरातन छात्रों ने डा.सौरभ मालवीय जी का स्वागत किया। पुर्व छात्रों को संबोधित करते हुए डा.मालवीय जी ने कहा कि अपने अपने कर्तव्य पथ पर चलते हुए अपने आसपास के परिवेश को भी अपनी सफलता से लाभान्वित करके हम एक बेहतरीन भारत एक भारत श्रेष्ठ भारत की संकल्पना को अधिक प्रभावी ढंग से साकार कर सकते हैं।हम सभी अपने जीवन में निश्चित ही ऐसे पड़ाव पर हैं अथवा पहूंच रहें हैं जहां से समाज में परोपकार के आदर्श को वास्तविक रूप से क्रियान्वित कर सकें। उन्होंने आह्वान किया कि इस आदर्श को वास्तविक रूप में अवतरित करने हेतु अपने विचार परिवार में और भी लोगों को जोड़ने का अभियान चलाएं।एक अकेला थक जाएगा,मिल कर हाथ बढ़ाना,..साथी हाथ बढ़ाना..
को स्पष्ट करते हुए कहा कि ऐसी ऐसी कड़ियों को जोड़ कर हम एक ऐसी श्रृंखला का निर्माण करना है जो समाज के सभी वर्गों को अपने कर्मों से सुखी करें।

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विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश

विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश भारतीय संस्कृति एवं राष्ट्रवाद पर आधारित शिक्षा प्रणाली का प्रमुख संस्थान है। इसकी नींव 1952 में गोरखपुर के पक्कीबाग़ में पहले “सरस्वती शिशु मंदिर” के रूप में रखी गई, जो संस्कारयुक्त शिक्षा प्रदान करने का केंद्र बना। 1958 में शिशु शिक्षा प्रबंध समिति का गठन हुआ, और 1977 में इसे अखिल भारतीय पहचान मिली, जिससे विद्या भारती देश का सबसे बड़ा गैर-सरकारी शिक्षा संगठन बन गया। यह संगठन राष्ट्रवादी शिक्षा, संस्कार, योग, संगीत, और चरित्र निर्माण को प्राथमिकता देता है। विद्या भारती भारतीय शिक्षा दर्शन को समृद्ध करने के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान और तकनीकी शिक्षा को भी बढ़ावा देती है।

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