आधारभूत विषय
शारीरिक शिक्षा
शारीरिक शिक्षा
शारीरिक शिक्षा एक आधारभूत विषय है जिसका उद्देश्य विभिन्न शारीरिक क्रियाओं और खेल गतिविधियों के माध्यम से छात्रों के संपूर्ण व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है, जिससे वे स्वस्थ और प्रभावी जीवन शैली अपना सकें |
शारीरिक स्वास्थ्य : छात्रों को शारीरिक रूप से स्वस्थ और सक्रिय बनाने में मदद करना |
शारीरिक कौशल का विकास : खेलों और शारीरिक गतिविधियों के माध्यम से शारीरिक कौशल, जैसे कि संतुलन, समन्वय, चपलता, गति, शक्ति और प्रतिक्रिया समय का विकास करना |
मानसिक विकास : शारीरिक शिक्षा छात्रों के मानसिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि यह उन्हें ध्यान केंद्रित करने, टीम में काम करने और नियमों का पालन करने में मदद करती है |
सामाजिक विकास : शारीरिक शिक्षा छात्रों को सामाजिक रूप से विकसित करने में भी मदद करती है, क्योंकि वे विभिन्न प्रकार के लोगों के साथ बातचीत करते हैं और टीम भावना से काम करते हैं |
आजीवन सक्रियता : शारीरिक शिक्षा छात्रों को जीवन भर शारीरिक गतिविधि में सम्मिलित रहने के लिए प्रेरित करती है |
शारीरिक शिक्षा के लाभ :
स्वस्थ जीवन : शारीरिक शिक्षा छात्रों को स्वस्थ जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है |
शारीरिक फिटनेस : शारीरिक शिक्षा छात्रों को शारीरिक रूप से फिट रहने में मदद करती है |
कौशल विकास : शारीरिक शिक्षा छात्रों को विभिन्न प्रकार के कौशल विकसित करने में मदद करती है|
आत्मविश्वास : शारीरिक शिक्षा छात्रों को आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान विकसित करने में मदद करती है|
सामाजिकता : शारीरिक शिक्षा छात्रों को सामाजिक रूप से विकसित करने में मदद करती है |
शारीरिक शिक्षा कार्यक्रम
14 से 18 दिसंबर 2024 कुरुक्षेत्र में क्षेत्रीय शारीरिक संयोजक की बैठक हुई। इसमें पंचकोषात्मक विकास की चर्चा हुई। माननीय गोबिंद महंत जी, श्री अवनीश भटनागर, श्री राम अरावकर , श्री दुर्ग सिंह चौहान जी का उद्बोधन प्राप्त हुआ। विद्या भारती की अखिल भारतीय शारीरिक शिक्षा पाठ्यक्रम निर्माण कार्यशाला केदारधाम , ग्वालियर का समापन आज अखिल भारतीय सह संगठन मंत्री श्री राम जी अरावकर एवं विद्या भारती खेल परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र सिंह जी के द्वारा किया गया इस अवसर पर अखिल भारतीय शारीरिक शिक्षा संयोजक श्री दुर्गसिंह जी राजपुरोहित तथा राजस्थान क्षेत्र के सह संगठन मंत्री श्री गोविंद कुमार जी मंच पर विराजमान थे।
योग शिक्षा
योग शिक्षा
योग भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर एवं निरोगी, निर्दोष जीवन का आधार है।योग विशुद्ध विज्ञान है। योग के द्वारा बालक के शारीरिक अवयवों को सशक्त , इन्द्रियों को नियन्त्रित, मन को एकाग्र , भावनाओं को संतुलित, प्राण को सबल एवं बुद्धि को अनुशासित बनाकर उसे अहंकार, द्वेष से मुक्त कर आत्मिक निर्मलता प्रदान किया जा सकता है। ऐसा बालक ही सर्वस्व समर्पण की भावना से प्रेरित होकर देश और धर्म की रक्षा कर सकेगा। विद्या भारती के सभी विद्यालयों में बालक शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यामिक दृष्टि से विकसित होते हुए आदर्श समाज की रचना में अपना योगदान दे सकें, यह प्रयास एवं व्यवस्था सतत चलती रहती है। इसी को दृष्टि में रखकर विद्या भारती ने अखिल भारतीय स्तर पर कक्षानुसार योग शिक्षा का पाठ्यक्रम निर्धारित किया है। योग शिक्षा का विशेष प्रशिक्षण देने के लिए क्षेत्रशः केन्द्र स्थापित किये जा रहे है जहाँ प्रशिक्षण के कार्यक्रम संचालित होते रहते है ।
संगीत शिक्षा
संगीत शिक्षा
विद्या भारती में संगीत शिक्षा का महत्व समग्र व्यक्तित्व विकास में है, जो विद्यार्थियों में कलात्मक जागरूकता, आत्म-अभिव्यक्ति और आत्मविश्वास विकसित करता है, साथ ही उन्हें विभिन्न संस्कृतियों से परिचित कराता है |
संगीत शिक्षा का महत्व:
समग्र विकास : संगीत शिक्षा बच्चों के व्यक्तिगत, सामाजिक, मानसिक और शारीरिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है |
कलात्मक जागरूकता : संगीत बच्चों में कलात्मक जागरूकता और सौंदर्य बोध को विकसित करता है|
आत्म-अभिव्यक्ति : संगीत बच्चों को अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने का एक माध्यम प्रदान करता है |
आत्मविश्वास : संगीत सीखने और प्रदर्शन करने से बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ता है |
सामाजिक कौशल : संगीत शिक्षा बच्चों को सामाजिक कौशल विकसित करने में मदद करती है, जैसे कि टीम वर्क और सहयोग |
सांस्कृतिक समझ : संगीत विभिन्न संस्कृतियों से परिचित कराता है और बच्चों में सांस्कृतिक समझ विकसित करता है |
जीवन कौशल : संगीत शिक्षा बच्चों को मूल्यवान जीवन कौशल सिखाती है, जैसे कि अनुशासन, ध्यान केंद्रित करना, और समस्या समाधान |
संगीत शिक्षा के उद्देश्य :
कलात्मक क्षमता का विकास : बच्चों में संगीत के प्रति प्रेम और समझ विकसित करना |
सांस्कृतिक मूल्यों का संवर्धन : भारतीय संगीत और कला की संस्कृति को बढ़ावा देना |
व्यक्तित्व का विकास : बच्चों के व्यक्तित्व के सभी पहलुओं को विकसित करना |
सृजनात्मक क्षमता का विकास : बच्चों में रचनात्मकता और कल्पना शक्ति का विकास करना |
भावनात्मक संतुलन : बच्चों में भावनात्मक संतुलन और स्थिरता विकसित करना |
आत्म-अनुशासन : संगीत के माध्यम से बच्चों में आत्म-अनुशासन और एकाग्रता विकसित करना |
सामाजिक कौशल का विकास : बच्चों में सामाजिक कौशल और सहयोग की भावना विकसित करना|
जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण : बच्चों में जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण और आत्मविश्वास विकसित करना|
संस्कृत शिक्षा
संस्कृत शिक्षा
संस्कृत शिक्षा शिशुकों के सर्वांगीण विकास हेतु विद्या भारती का व्यापक दृष्टिकोण है, जो भारतीय दर्शन एवं जीवन -मूल्यों पर आधारित है। सर्वागीण विकास का तात्पर्य पंचकोषीय विकास से है, जो शिशुओं को शारीरिक प्राणिक, मानसिक, बौधिक एवं आध्यात्मिक रूप से पूर्ण विकसित कर दे। उक्त लक्ष्य हेतु विद्या भारती ने अपने पाठ्यक्रम में पाँच आधार भूत विषयों को स्थान दिया है। शारीरिक, योग, संगीत, संस्कृत, नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा द्वारा अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, ज्ञानमय एवं आनन्दमय कोश का सम्बर्धन किया जाता है। ज्ञानमय कोश की अभिवृद्धि के लिए संस्कृत शिक्षा परमावश्यक है-
बिना वेदं, बिना गीतां, बिना रामायणी कथाम ।
कालिदासम बिना लोके, किद्रशी भारतीयता ||
सम्पूर्ण भारतीय ज्ञान-विज्ञान संस्कृत भाषा में ही निहित है, संस्कृत वाङ्मय के अध्यापन के बिना भारतीय ज्ञान-विज्ञान को समझ पाना, दिवास्वप्न सदृश है | यदि अपनी संस्कृति, संस्कार तथा जीवन मूल्यों को अक्षुण्य रखना है तो संस्कृत भाषण का अध्ययन परमावश्यक है, उक्त दृष्टि से ही विद्या भारती ने अपने विद्यालयों में संस्कृत शिक्षा को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है | संस्कृत शिक्षण हेतु संस्कृताचार्यों व शिशुओं में संस्कृत भाषा के अध्ययन हेतु रूचि उत्पन्न हो इसके लिए भाषा श्रवण का अवसर प्रदान करना होगा | यदि हम भाषा को अपने भाषण का आधार नहीं बना सकते तो फिर शिशुको को भाषा श्रवण का अवसर कैसे प्राप्त होगा | भाषा का आरम्भ तो केवल श्रवण से ही संभव है|
यतो हि भाषा शिक्षणस्य चत्वारि सोपानानी सन्ति श्रवणं भाषणं चैव पठनं लेखनं तथा |
अतः हमे स्वयं संस्कृत भाषा में सम्भाषण करना होगा। छोटे-छोटे सरल वाक्यों, गीतों, कहानियों के माध्यम से हम कक्षा का वातावरण संस्कृत – शिक्षण के अनुकूल बनायें निरन्तर संस्कृत बोलने का अभ्यास करें । छात्रों को सुनने का अवसर प्राप्त हो गीतों, सुभाषितों, सूक्तियों के आध्यमा से संस्कृत भाषा में निहित दिव्य ज्ञान को यदि छात्रों के समक्ष प्रस्तुत किया जायेगा तो निश्चित ही उनको अभिरूचि संस्कृत के अध्ययन हेतु जागृत होगी। उक्त लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु विद्या भारती द्वारा क्षेत्र, प्रदेश तथा संकुल स्तर पर संस्कृत विषय के आचार्यों का संस्कृत सम्भाषण अभ्यास वर्ग आयोजित करना होगा। विविध अत्याधुनिक संसाधनों द्वारा अपने को अभिनव शिक्षण कौशल से सुसज्जित करना होगा । विद्यालय स्तर पर संस्कृत का बातावरण निर्मित करना होगा | विद्या भारती ने सप्ताह में सोमवार को संस्कृत दिवस के रूप मे स्वीकार किया है अस्तु हमारा प्रयास हो कि विद्यालय की सम्पूर्ण गतिविधियां संस्कृत भाषा में ही संचालित हों। विद्यालय व्यवस्था को इस कार्य में पूर्ण सहयोग देना होगा |
अभिभावकों से अपेक्षा
एक वैदिक सूक्ति है जिसमें परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए पिता कहता है-
सर्वत्र विजयं कांक्षे – पुत्रात् शिष्यात् पराजयम
भाव यह है कि पिता अपनी सन्तान में अपने से आधिक सद्गुण, सद्संस्कार, यश, धन, बल, आदि की कामना करता है, श्रेष्ठ – अभिभावक का दायित्व बनता है, कि अपनी सन्तान में सद्गुण विकास हेतु सहयोग प्रदान करें, अस्तु उन्हे संस्कृत-अध्ययन हेतु प्रोत्साहित करें|
नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा
नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा
नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा बालक के चरित्र निर्माण की प्रक्रिया है। बालकों में जिन अच्छी आदतों को उनके जीवन का अंग बनाना चाहते हैं उनका बार-बार अभ्यास कराना होता है। बालक नैतिक शिक्षा का अप्रत्यक्ष पाठ परिवार में माता-पिता से प्राप्त करता है तथा विद्यालय जाने पर अपने शिक्षक से। बालक के मन में माता-पिता से अधिक प्रभाव अपने शिक्षक के आदर्श जीवन का रहता है। शिक्षक के मुख से निकला हम हर शब्द बालक के लिए वेद वाक्य के समान होता है। राष्ट्र की भावी पीढ़ी के निर्माण में शिक्षकों की अहम भूमिका रहती है। तभी तो महादेवी वर्मा ने एक भेटवार्ता में कहा था कि “सुमार्ग पर जाने वाला विद्यार्थी शिक्षक को जीवन को कीर्तिमान बनाता है।”
विद्याभारती द्वारा नैतिक मूल्यों को सूची बद्ध करके पाठ्यक्रम का स्वरूप दिया गया है। यह पाठ्यक्रम अत्यंत विस्तृत है तथा इस वर्ष इसका पुनरीक्षण किया गया है। बालकों में नैतिकता के विभिन्न मूल्यों को चरितार्थ करने के उद्देश्य से सभी आचार्यों के पास इसकी एक-एक प्रति उपलब्ध कराना तथा अपने-अपने विषय को पढ़ाते समय पाठ्यक्रम नैतिक गुणों का प्रभावी सम्प्रेषण किया जाना अपेक्षित है।
विषय के क्रियान्वयन की दृष्टि से निम्नलिखित सुझाव प्रयोग में लाए जा सकते हैं-
- 1. प्रत्येक आचार्य अपने विषय के साथ नैतिक शिक्षा का भी आचार्य है।
- विभिन्न विषयों को पढ़ाते समय नैतिक गुणों का विकास करने का प्रयत्न सभी आचार्यों, द्वारा हो। जैसे
– गणित के माध्यम से बच्चों में सत्यनिष्ठा, धैर्य एवं आत्म विश्वास जैसे गुणों का विकास करना।
– विज्ञान विषय के माध्यम से वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संकल्प शक्ति, स्वच्छता एवं स्वाध्याय के प्रति जागरुकता एवं सृजनशीलता का गुण विकसित करना।
– इतिहास एवं नागरिक शास्त्र के माध्यम से राष्ट्रीयता, देश भक्ति, कर्त्तव्य निष्ठा एवं दायित्व बोध का संस्कार देना।
– अर्थशास्त्र के अध्यापन के साथ प्रामणिकता, ईमानदारी तथा देश की आर्थिक एवं सामाजिक समृद्धि में योगदान आदि बताना।
– भाषा-कला एवं साहित्य इसके माध्यम से स्वदेशी निष्ठा, सामाजिक अन्याय एवं कुरीतियों के विरुद्ध संघर्षशीलता, नेतृत्व क्षमता का विकास।
- घर एवं विद्यालय में संस्कारक्षम वातावरण का निर्माण।
- बालकों से प्रतिदिन अनौपचारिक वार्तालाप (माता-पिता एवं आचार्य द्वारा) करना।
- पाठ्य सहगामी क्रियाकलाप एवं अन्य गतिविधियां जैसे शिशु/बालभारती एवं छात्र संसद के क्रिया कलाप, बालसभा, बालशिविरों का आयोजन, प्राकृतिक आपदाओं के समय सेवा एवं सहायता।
- विद्यालय की दैनिक गतिविधियों में बालकों में नैतिक विचारों के व्यावहारिक रूप से अपनाने की भावना जगाना-प्रार्थना, प्रेरक प्रसंग, कथा-कथन, योग एवं शारीरिक कार्यक्रम आदि।
- बालक के नैतिक गुणों, ज्ञान, व्यवहार व आचरण का समय-समय पर मूल्यांकन करना आदि।
आयाम
विद्वत परिषद
विद्वत परिषद
विद्या भारती के चार केंद्रीय विषय-प्रशिक्षण, मानक परिषद, विद्वत परिषद व शोध संचालित होते हैं। विद्वत परिषद द्वारा शिक्षा एवं समाज के विभिन्न महत्वपूर्ण एवं प्रासंगिक विषयों पर चिंतन-मनन कर गोष्ठियों एवं कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिससे समाज को सही दिशा मिल सकें। विद्वत परिषद विद्या भारती का मुख्य उद्देश्य जन जागरण एवं प्रबोधन का कार्य करना है। इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, शैक्षिक नीति-निर्धारकों, विचारकों एवं प्रबुद्धजनों आदि को इस परिषद में कार्य अनुकूल जोड़ा जाता है। विद्या भारती को समय-समय पर इन प्रबुद्धजनों का परामर्श एवं मार्गदर्शन प्राप्त होता है। विद्वत परिषद मुख्य रूप से दो पहलुओं पर कार्य करती है-
- समाज 2. विद्यालय
समाज के लिए करणीय कार्य हैं-
- देश के पूरे शिक्षातंत्र को प्रभावित करना।
- समाज में भारतीय शिक्षा पद्धति, शिक्षा दर्शन, शिक्षा मनोविज्ञान और शिक्षा संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना।
- उक्त विषयों हेतु शिक्षा का आदर्श मॉडल समाज में खड़ा करना।
- देश में सरकारी-गैर सरकारी सभी शिक्षा पद्धतियों का भारतीयकरण करना और उसे समाज के सम्मुख रखना।
- समाज में विमर्श की नई व्याख्या/नैगेटिव स्थापित करना, जैसे भारतीयों के हृदय से हीनभावना को दूर करना।
- समाज को राष्ट्रीय दृष्टिकोण देना।
- विद्याभारती को अन्य मंचों पर स्थापित करना
- साहित्यिक कार्य (लेख, पत्रिकाओं आदि) के माध्यम से भारतीय विचारधारा को समाज में प्रचार-प्रसार करना।
विद्यालय स्तर पर तीन करणीय कार्य हैं-
- विद्यालय में शैक्षिक स्तर को बढाना।
- आदर्श विद्यालय खड़ा करना।
- सरकारी तंत्र से मिलकर घनिष्ठ संबंध स्थापित करना और विद्वतजनों को विद्यालय से जोड़ना।
विद्वत परिषद का कार्य प्रशिक्षण नहीं बल्कि जागरण और प्रबोधन है। तथा भारतीय चिंतन को समाज में ले जाना है। इसके लिए विद्वत परिषद की क्षेत्रीय भूमिका समन्वय की है- इसके करणीय कार्य हैं-
- क्षेत्र और प्रांत स्तर पर पंचांग/ वार्षिक कैलेंडर बनाना।
- वार्षिक कैलेंडर को लागू करने के लिए व्यवस्था खड़ी करना, संगठनात्मक संरचना तैयार करना।
- प्रत्येक कार्यक्रम के लिए एक प्रमुख बनाना।
- कार्यक्रम को सुचारु रूप से चलाने के लिए प्रवास करना, कार्यक्रम की अनुश्रवण/निरीक्षण करना।
- कार्यक्रम के प्रभाव और परिणामों का आंकलन/समीक्षा करना।
शोध
शोध का परिचय
विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान, शिशु मन्दिर एवं विद्या मन्दिर नाम से प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर की शिक्षा का संचालन करती है। हमारा संकल्प है कि हम ज्ञान के साथ संस्कार एवं आधुनिक शिक्षा पूर्ण गरिमा व गुणवत्ता के साथ भैया-बहनों को प्रदान करते हैं। विद्या भारती के विद्यालयों में अनुशासन समय-पालन, गुणवत्तापूर्ण पठन-पाठन, सामाजिक समरसता, संस्कार, शिक्षा विभाग द्वारा स्थापित नियम-पालन के लिए हम संकल्पबद्ध है। शोध प्रकोष्ठ की स्थापना से उपर्युक्त के साथ-साथ समय-समय पर उत्पन्न विद्यालयीय समस्याओं का समाधान भी क्रिया शोध के माध्यम से होता रहे, इसकी शोध के द्वारा अपेक्षा की गई। हमारे आचार्य / प्रधानाचार्य, जिला, संकुल स्तर पर टोली बनाकर प्रांत व क्षेत्रय स्तर पर इस कार्य में सहयोग प्रदान करने का कार्य करते हैं। तथा समय-समय पर कृत-कार्य की समीक्षा भी होती रहती है।
संस्कृति बोध परियोजना
संस्कृति बोध परियोजना
विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान, कुरुक्षेत्र विद्या भारती के विद्यालयों के छात्र छात्राओं आचार्यो एवं अभिभावकों को आधुनिक ज्ञान विज्ञान के सह अपनी महान संस्कृति गौरवपूर्ण इतिहास महापुरुषों के जीवन चरित्र श्रेष्ठ परम्पराओ से परिचय कराने के लिए संस्कृति बोध परियोजना के अंतर्गत विभिन्न गतिविधियाँ आयोजित करती है |
- संस्कृति ज्ञान परीक्षा – संस्कृति ज्ञान परीक्षा विद्या भारती के विद्यालयों, समाज के अन्य विद्यालयों में, अभिभावकों के लिए आयोजित की जाती है |
- संस्कृति प्रवाह – विद्या भारती द्वारा चलाये जा रहे संस्कार केंद्र के भैया बहिनों के लिए संस्कृति प्रवाह पुस्तक के माध्यम से संस्कृति ज्ञान परीक्षा का आयोजन संस्कार केन्द्रों में किया जाता है |
- निबंध प्रतियोगिता – विद्या भारती संस्कृति संस्थान द्वारा कक्षा चतुर्थ से द्वादश तक के भैया बहिनों के मध्य हिंदी दिवस 14 सितम्बर को निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है | आचार्य बन्धु भगिनी की निबंध प्रतियोगिता 15 सितम्बर को आयोजित की जाती है | निबंध के विषय केंद्र के द्वारा निर्धारित किये जाते है |
- संस्कृति महोत्सव – संस्कृति महोत्सव विद्यालय स्तर से लेकर अखिल भारतीय स्तर तक आयोजित किया जाता है | महोत्सव में 7 प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किये जाते है |
- संस्कृति प्रश्न मंच
- बोध कथा
- आशु भाषण
- मूर्तिकला
- आचार्य पत्र वाचन
- लोकनृत्य
- संस्कृति वार्ता
- शैक्षिक विचार गोष्ठी – संस्कृति के विभिन्न विषयों पर चर्चा वार्ता हेतु वर्ष में दो बार शैक्षिक विचार गोष्ठियों का आयोजन केंद्र और प्रांतीय समितियों द्वारा किया जाता है |
- संस्कृति कार्यशाला – समाज में सांस्कृतिक विकास हेतु भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से क्षेत्र के सभी जिलो में चार प्रकार की कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है | यह कार्यक्रम विद्या भारती के साथ अन्य विद्यालायों के छात्र छात्राओं की सहभागिता होती है | ये कार्यशालाएं चार विषयों पर आधारित होती है –
- भारतीय संस्कृति के संरक्षण संवर्धन एवं उत्थान हेतु कार्यशाला
- भारतीय अनैतिक मूल्यों की स्थापना हेतु
- छात्र छात्राओं में वैज्ञानिक सोच के विकास हेतु कार्यशाल
- योग एवं स्वस्थ मानव जीवन जेतु कार्यशाला
पूर्व छात्र परिषद
Alumni Council, SVM Deoria Khas, Deoria [2012 – 2024]
Since its inception in 2012, Purv Chhatr Parishad has remained deeply committed to the welfare of Saraswati Vidya Mandir, Deoria Khas. Here’s a proud glimpse of the journey:
- 2012 – Formation of the council; celebrated Deepotsav with 100s of Diyas.
- 2013 – Hosted Murli Dutt Samman Samaroh to felicitate meritorious students.
- 2014 – Assisted our school in BTE Polytechnic Entrance Exams.
- 2015 – Alumni conducted all classes on Teacher’s Day.
- 2016 – Supported school in teacher recruitment; an alumnus joined the interview panel.
- 2020 – Arranged COVID-19 vaccines for staff and families; donated double the requested amount for tribal school aid.
- 2021 – Hosted Sannidhya-2021, launched alumni office, distributed Red Cross aid.
- 2022 – Launched website & Smaranika, honoured retiring staff, welcomed new principal, hosted dignitaries.
- 2023 – Organized Academic Counselling, Holi Milan, Margdarshan Karyakram, and a state-level meeting.
- 2024 – Holi Milan & Revisit with 250 alumni, essay competition on Madan Mohan Malviya.
Alumni Council, Gorakshprant [2023]
Felicitation Program in Rudrapur, Deoria
दिनांक ०५-जनवरी २०२३ को संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा आईएसएस में १०वां स्थान प्राप्त करने पर भैया श्रवण यादव को उनके विद्यालय सरस्वती शिशु मंदिर, रुद्रपुर, देवरिया में सम्मानित किया गया।
Academic Counselling in Deoria
दिनांक १४-जनवरी २०२३ को सरस्वती विद्या मंदिर, देवरिया में पूर्व छात्र परिषद् का वार्षिक कार्यक्रम मनाया गया जिसमें १०वीं तथा १२वीं के भैयाओं की विषय विशेषज्ञ पूर्व छात्रों द्वारा शैक्षिक काउंसलिंग कराई गई साथ ही परिषद् के यूट्यूब चैनल का भी प्रारम्भ किया गया।
Alumni Meet in Siddharth Nagar
दिनांक २६-जनवरी २०२३ को सरस्वती विद्या मंदिर, सिद्धार्थनगर में ‘हमारा छात्र हमारा गौरव’ विषयक पूर्व छात्र सम्मेलन आयोजित किया गया।
Holi Milan in Deoria
दिनांक ०५-मार्च २०२3 को सरस्वती विद्या मंदिर, देवरिया में होली मिलन कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में गोरक्षप्रांत के प्रान्त संगठन मंत्री श्री रामय जी का भी सान्निध्य प्राप्त हुआ।
Margdarshan Karyakram in Deoria
दिनांक२६-जुलाई २०२३ को सरस्वती विद्या मंदिर, देवरिया में ‘मार्गदर्शन कार्यक्रम’ के अंतर्गत छत्तीसगढ़ शाषन के वैज्ञानिक अधिकारी भैया शशांक द्विवेदी के साथ १०वीं तथा १२वीं के भैयाओं का संवाद कराया गया।
Plantation program in Mau
दिनांक१५-अगस्त २०२३ को सरस्वती विद्या मंदिर, बड़ा पोखरा, मऊ में वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किया गया।
Margdarshan program in Deoria
दिनांक०५-सितम्बर २०२३ को सरस्वती विद्या मंदिर, देवरिया में ‘मार्गदर्शन कार्यक्रम’ के अंतर्गत राष्ट्रीय विज्ञानं अकादमी, नई दिल्ली के निदेशक डॉ० बसु कुमार द्वारा १०वीं तथा १२वीं के भैयाओं का संवाद कराया गया।
‘Matri-Shakti Sammelan’ in Basti
दिनांक२४-सितम्बर २०२३ को सरस्वती बालिका विद्या मंदिर, बस्ती की पूर्व छात्रा बहिनों ने मातृ शक्ति सम्मेलन का आयोजन किया।
Kartik Purnima Help Desk in Ballia
पूर्व छात्र परिषद्, बलिया के पूर्व छात्र भैयाओं ने दिनांक२7-नवम्बर २०२३कार्तिक पूर्णिमा के स्नान के अवसर पर निःशुल्क चाय एवं दवा वितरण के स्टाल लगाए।
शैक्षिक विषय एवं पद्धतियाँ
शिशुवाटिका
शिशु वाटिका में संस्कार युक्त शिक्षा
बच्चे राष्ट्र के भावी कर्ण धार हैं उन्हें इस गुरूत्तर दायित्व के निर्वहन हेतु तैयार करने तथा अपेक्षित ज्ञान व कौशलों से परिपूर्ण बनाने में शिक्षा की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। आज वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास के कारण जीवन के सभी क्षेत्रों में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए है। देश के बच्चे राष्ट्रीय विकास के साथ-साथ वैश्विक विकास के सहभागी और संवाहक बने इसके लिए शिक्षा के सभी पहलुओ पर विचार करना परमावश्यक है। शिक्षा के साथ-साथ बच्चे सदाचारी, अनुशासित एवं संस्कारी बनें और जीवन की सभी चुनौतियों को स्वीकार कर एक श्रेष्ठ नागरिक के रूप में देश व समाज का पथ प्रदर्शन कर सकें।
संस्कार युक्त शिक्षा का उद्देश्य – शिशु शिक्षा के विषय में शिक्षा जगत को सही दिशा देना शिशु शिक्षा के भारतीय स्वरूप दृष्टि से समाज को जाग्रत करना शिशु शिक्षा की भारती पद्वति विकसित करना घर एवं परिवार को शिशु संस्कार के लिए संस्कार क्षम बनाना। शिक्षा का अर्थ केवल अक्षर ज्ञान नहीं बल्कि शिक्षा का अर्थ बालक में छिपी हुई प्रतिभा को विकसित, पुष्पित और पल्लवित करने का अवसर देना। स्वामी विवेकानन्द जी कहते थे कि ज्ञान दुनिया में कहीं और नहीं फैला है वह ज्ञान तो बालक के अन्दर छुपा है। उस बालक के ज्ञान के घरौंदे को समझने की स्थिति उत्पन्न कर देना ही वास्तविक शिक्षा है। शिशु वाटिका में 3 से 6 वर्ष की आयु के बच्चे पढ़ते है। इस स्थिति में जो शिक्षा और क्रियाकलाप कराये जाते है। उनका पूरा प्रभाव उनके जीवन पर पढ़ता है। इसलिए संस्कार युक्त शिक्षा अति आवश्यक है। संस्कार युक्त शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य उस प्रकार है।
1. नैतिक और चारित्रिक विकास – बच्चों में ईमानदारी, सच बोलना और दूसरों का सम्मान करना सिखाना।
2. पूर्णता का विकास – बच्चे के भीतर निहित पूर्णता का विकास करना जिसमें शिक्षा और संस्कार का समन्वय हो।
3. सहन शीलता और समन्वय – दूसरों के साथ सद्भाव, करूण और समन्वय का भाव विकसित करना।
4. आत्म अनुशासन – बच्चों में अनुशासन, समर्पण, परस्पर सहयोग करने के गुणों का विकास।
5. सामाजिक समरसता और सद्भावना बढ़ाना – समाज में आपसी प्रेम, सद्भावना और सांमजस्य स्थापित करना।
6. जीवन जीने की कला सिखाना – बच्चों के जीवन को एक कला के रूप में परिष्कृत करने की क्षमता का विकास।
7. सेवा व त्याग की भावना – दूसरों की सेवा व त्याग की भावना का विकास करना।
8. धैर्य और आत्म संयम – बच्चों को जीवन में बाधाओं और संघर्षो से जूझने की क्षमता विकसित करना।
शिक्षा का लक्ष्य – सा विद्या या विमुक्तये अर्थात विद्या वह है जो हमें मुक्ति प्रदान करे। इस प्रकार शिक्षा का लक्ष्य तो अत्यन्त उच्च है परन्तु यहाँ हम शिशु वाटिका के भैया/बहिनों की शिक्षा पर विचार करेंगे। शिशु वाटिका के बच्चों को सर्वांगीण विकास आवश्यक है इसलिए हमें उनके शिक्षण में गतिविधियों एवं विभिन्न क्रियाकलापों का समावेश करना पड़ेगा। इस निमित्त शिशु वाटिका का पाठ्यक्रम, निश्चित करके तद्नुरूप पाठ्य पुस्तकें शिक्षण सहायक सामग्री, विद्यालय भवन तथा अनुभवी एवं प्रशिक्षित आचार्य एवं आचार्यों की व्यवस्था करनी होगी। तब हम बच्चों के सर्वांगीण विकास की कल्पना कर सकेंगे। सर्वांगीण विकास में प्रमुख रूप से पाँच बिन्दुओं पर हम ध्यान केन्द्रित करें।
1. आध्यात्मिक विकास – बच्चों में आध्यात्मिकता बढ़े। उनकी आस्था देवी देवताओं में हो। ईश्वर के विषय में जानकारी हो। इसलिए विद्यालय में धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाये। जयन्ती एवं पर्व मनोरंजन किया जाये। वन्दना सभा को संस्कार क्षम एवं प्रभावी बनाया जाये। जिसे देखकर बच्चें आकर्षित हों और अपना स्वभाव व व्यवहार में आध्यात्मिकता लायें।
2. बौद्धिक (जानात्मक) विकास – बच्चों को अक्षर ज्ञान व अंक ज्ञान के साथ विभिन्न प्रकार के क्रियाकलाप करायें। जिससे उनका ज्ञानात्मक विकास हो। बच्चें अर्जित ज्ञान का जीवन में उपयोग कर सके। इसके लिए बच्चों के स्तर के अनुसार पाठ्यक्रम निर्धारित किया जाये और तद्नुरूप पाठ्य पुस्तकों की रचना कह जाये। इस प्रकार बच्चों का ज्ञानात्मक व विकास होगा।
3. शारीरिक विकास – शिशु वाटिका के छोटे बच्चें सुकोमल होते है उनका पूर्ण शारीरिक विकास नहीं होता है। इसलिए विद्यालय में प्रतिदिन एक घंटा खेलकूद, व्यायाम योग आसन व ध्यान कराना अच्छा रहेगा। खेलने कूदने से बच्चों का मनोरंजन होगा और वे स्वस्थ्य व प्रसन्न रहेगे। जिसका प्रभाव उनके शारीरिक विकास पर पड़ेगा। बच्चों की सभी ज्ञानेन्द्रियाँ विकसित हो। वे देखकर, सुनकर, सूंघकर, छूकर और चखकर उसके स्वाद एवं गुण से परिचित हो अतः प्रतिदिन वे वेला इन्द्रिय विकास की रहनी चाहिए। जिससे बच्चों की ज्ञानेन्द्रियाँ ठीक प्रकार से हर विषय को समझ सके। शिशु वाटिका के कार्यक्रम- वन्दना सभा, सामूहिक भोजन, प्रथम दिनोत्सव, जन्मोत्सव शिशु सभा उत्सव और पर्व मनाना संगीत सभा शोभा यात्रा, वार्षिकोत्सव नगर भ्रमण शिशु शिविर, शिशु नगरी, विद्यारम्भ संस्कार, खेलकूद दिवस शारीरिक प्रदर्शन घोष आदि।
4. नैतिक विकास – बच्चों में नैतिकता आये। उनमें सत्य, प्रेम, सम्मान, आज्ञाकारी, ईमानदारी, अनुशासन परोपकार, सहयोग सेवा, देश भक्ति आदि गुण का विकास हो और वे चरित्रवान, संस्कारी बन सके। इसलिए उनकी नैतिक शिक्षा पर बल दिया जाय। प्रतिदिन एक वेला नैतिक शिक्षा की हो जिसमें उन्हें देश की प्राचीन संस्कृति महापुरूषों का जीवन परिचय प्ररेणादायी प्रसंग, बोध कथाएँ सुनायी जायें जिनसे वे प्ररेणा ले सके।
5. सामाजिक विकास – शिक्षा ग्रहण करते हुए बच्चें समाज से जुड़े इसका भी विद्यालय स्तर पर प्रयास हो। इसके लिए विभिन्न सामाजिक कार्य बच्चों से करवाना चाहिए। श्रमदान, जलप्याऊ, सांक्षरता मेल-मिलाप गोष्ठी स्वच्छता, पर्यावरण, वृक्षारोपण आदि कार्यक्रमों के द्वारा बच्चें समाज से जुड़ेंगे तथा उनका सामाजिक रहन-सहन, खान-पान, आचार-विचार पर भी प्रभाव पड़ेगा। ऐसे कार्यक्रम विद्यालय स्तर पर अनिवार्य रूप से आयोजित करना चाहिए। सर्वांगीण विकास में सहायक शिशु वाटिका के कार्यक्रम- संस्कार युक्त शिक्षा के लिए शिशु वाटिका एक विशेष शिक्षा पद्वति को अपनाया है। जिसमें नये-नये प्रयोग विभिन्न कार्यक्रम, बालकेन्द्रित एवं क्रिया आधारित शिक्षण एवं विभिन्न क्रियाकलाप कराये जाते है। जो बालको के सर्वांगीण विकास में
सहायक होते है। शिशु वाटिका के प्रमुख क्रियाकलाप इस प्रकार है।
1. वार्तालाप – वार्तालाप एक अनौपचारिक व्यावहारिक क्रिया है। शिशुओं को बाते करना बहुत अच्छा लगता है। विशेषकर जब कि वार्तालाप का विषय उसके घर, खिलौनों, भोजन अथवा विद्यालय आदि से जुड़ा हो। परस्पर वार्तालाप को वह सुनता भी है और बोलता भी है।
2. कहानी – कहानी शिशु के भाषा विकास में दूसरा सहायक विकास कलाप शिशुओं को कहानी सुनाकर केवल संस्कारित भाषा विकसित किया जा सकता है। अपितु जीवन का व्यावहारिक अनुभव, कल्पनाशीलता, तर्क शक्ति, सामान्य ज्ञान और अनुमान शक्ति को बढ़ाकर, बौद्धिक विकास किया जा सकता है।
3. नाटक – भाषा विकास में सहायक कहानी को यदि वार्तालाप का रूप दे दिया तो वह नाटक बन जाएगा। हम जानते है कि शिशु अनुकरण से सीखता है। अथवा है, वैसा ही करता है। यह अनुकरण
नाटक ही तो है।
4. गीत – गीत, शब्द, भाव, लय, स्वयं और ताल का मिश्रण है। अतः भावयुक्त शब्दों को स्वर, लय और ताल के साथ गाने से शिशु की भाषा का विकास अर्थात शारीरिक विकास तो होता ही है इसके अतिरिक्त उसके व्यक्तित्व का प्राणिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यत्मिक विकास होता हैं। मन एकाग्र होता है, स्मरण शक्ति बढ़ती है। और आनन्द की प्राप्ति होती है।
5. संगीत – संगीत का अनुभव, शिशु गर्भ में ही करने लगता है। शिशु वाटिका में क्रियाकलाप के माध्यम से सिखाना आवश्यक है। क्योकि शिशु अवस्था में ही ये संस्कार हो जाना चाहिए। अतः यथा सम्भव, विद्यालय में प्रवेश के समय प्रार्थना में, भोजन के समय और अन्य क्रियाकलाप करवाते समय भी कम आवाज शिशुओं को संगीत सुनाना चाहिए।
6. श्लोक, सूत्र एवं मन्त्र पाठ – संस्कृत वाणी को शुद्ध करती है। अर्थात मातृभाषा के शुद्ध उच्चारण है। संस्कृत सहायक जननी है। दूसरा इनका सम्बन्ध संगीत से हैं। मन्त्र एवं श्लोक का गायन सस्वर किया जाता है। शिशु की वाणी को स्वर लय आरोह-अवरोह आदि का ज्ञान होता है।
7. योग – शिशु का मानसिक विकास करने के लिए यो एक समर्थ साधन है। शरीर, बुद्धि और इन्द्रियों का संचालन मन के हाथ में है। और मन का स्वभाव चंचल है। अतः शरीर बुद्धि और इन्द्रियों को नियन्त्रित रखने के लिए मन को नियन्त्रित करना अनिवार्य है। तभी श्रेष्ठ निर्माण किया जा सकता है। जैसे- ऊँ का उच्चारण, भ्रामरी प्राणायाम, अनुलोम-विलोम, ताड़ासन, बज्रासन आदि।
8. साज-सज्जा – साज-सज्जा अर्थात स्वच्छता एवं सौन्दर्य बोध ये भी एक संस्कार है। शिशु वाटिका का भवन, कक्षा-कक्ष, वन्दना सभा, खेल का मैदान, बागीचा इन सभी की स्वच्छता रखने और साज-सज्जा का संस्कार शिशुओं की देने की आवश्यकता है। जैसे- पूजा की तैयारी, पूजा की थाली, तोरण बनाना, रंगोली बनाना, गमलों में पौधे लगाना, माला बनाना, गमलों को रंगना आदि शिशुओं से करवाना चाहिए।
9. खेल – शिशुओं को खेलों में किसी प्रकार की स्पर्धा, हार-जीत, परिणाम, पुरस्कार आदि नहीे होने चाहिए। खेलो का मुख्य उद्देश्य शिशुओं का विकास करना। भाग- दौड़ के खेलों से शारीरिक विकास होता है। जैसे- संतुलन बनाकर ईंटों पर चलना, रस्सी के झूलें पर चढ़ना, टायर पर कूदना, सुरंग से निकलना, मिट्टी पर कूदना आदि खेल के माध्यम से निष्काम कर्मयोग का भाव शिशु को मिलता है। और वह चिर जीवन्त रहे तो जीवन जीने की कला आती है। यही आनन्द की अनुभूति आध्यात्मिक विकास है।
10. बागवानी – शिशुओं से बागवानी करवाने का क्रियाकलाप शिशु विकास का प्रत्यक्ष साधन है। क्योकि मानव शरीर पाँच महाभूत तत्वों से बना है। पृथ्वी, जल, वायु, तेज और आकाश। बागवानी के माध्यम शिशु सीधा-सीधा इन पाँच तत्वों के सम्पर्क में आता है। जैसे- मिट्टी छानना, गमले में पौधा लगाना, फूल चुनना, पौधों में पानी डालना आदि। इन सब क्रियाओं को करने के लिए उपयुक्त संख्या में साधन सामग्री शिशु वाटिका में उपलब्ध होने चाहिए। जैसे- छोटे-छोटे आकार के खुरपी, फॉवड़ा, गमले, तसला, कुदार आदि।
11. उद्योग – स्वयं के विकास की इच्छा शिशु में जन्मता होती है। अपनी अन्तः प्ररेणा से प्रेरित हो निरन्तर ही, निरूद्देश्य क्रियायें करता है। और उसका आनन्द लेता है। शिशु के इन्हीं गुणों लाभ उठाते हुए शिशु वाटिका की आचार्या बहन शिशुओं के रूचि के अनुरूप उनके हाथों में काम दे दे। और वातावरण बना दे तो उसका विकास सुनिश्चित है। जैसे- मिट्टी कूटना, मिट्टी छानना, मिट्टी भरना, पेन्सिल से कागज पर चित्र बनाना, चित्रों पर रंग भरना, ठप्पा कार्य लगाना, कागज की तह लगाना, कागज मोड़ना, कागज फाड़ना, आकृति बनाना, कागज कपड़ा रेत रूई आदि को चित्र पर गोंद लगाकर चिपकाना।
12. दैनन्दिन जीवन व्यवहार – जीवन के व्यवहार को शिशु आस-पास किए जा रहे। दैनिक कार्यो के माध्यम से ही सीखता है। बड़ों द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कार्य को वह स्वयं क्रिया करके आत्मसात् करना चाहता है। फिर चाहे वह झाडू लगाना हो, अखबार पढ़ना या जूतों पर पालिश करना। अपनी अन्तः प्रेरणा से प्रेरित हो वह स्वयं दांत मांजना, नहाना और वस्त्रादि पहनना जैसे कार्य भी स्वयं करना चाहता है। ऐसा करने से उसमें जीवन व्यवहार की कुशलता विकसित होती है।
13. प्रयोग – ज्ञानेन्द्रियों अनुभव के द्वारा अर्जित ज्ञान को, बुद्धि के माध्यम से कर्मेन्द्रियों अभिव्यक्ति के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से करना ही प्रयोग है अर्थात प्रत्यक्ष क्रिया के द्वारा अनुभव प्राप्त करना। परन्तु शिशु वाटिका में अनौपचारिक पद्वति से पदार्थो के गुण धर्म आदि के परिचय के निमित्त किए गए क्रियाकलापो को ही प्रयोग का नाम दिया गया है। जैसे- मिट्टी, वायु, पानी और धातु आदि का व्यावहारिक परिचय एवं अनुभव, शिशु को देना ही प्रयोग है। लेकिन छोटे-छोटे प्रयोगों के माध्यम से, शिशु को इनके विषय में सामान्य ज्ञान दिया जा सकता है। स्मरण रहे कि शिशु का 89 प्रतिशत विकास, शिशु में ही होता है।
14. निरीक्षण – किसी दृश्य अथवा वस्तु को, ध्यान से ध्यानपूर्वक देखना ही निरीक्षण है। किसी चित्र में क्या-क्या दिखाई दे रहा है? दो चित्रों में क्या-क्या समानता है अथवा क्या-क्या अन्तर, भेद, भिन्नता है? निरीक्षण से एकाग्रता मानसिक विकास कोष और आनन्दमय कोष व्यक्तित्व विकास का विकास होता है।
शिशु वाटिका की शैक्षिक व्यवस्थाएँ-
1. चित्र पुस्तकालय, 2. रंगमंच, 3. क्रीडांगण, 4. बागीचा, 5. कलाशाला, 6. कार्यशाला, 7. घर, 8. विज्ञान, प्रयोगशाला 9. चिड़ियाघर, 10. वस्तु संग्रहालय, 11. प्रदर्शनी कक्ष, 12. तरणताल
शिशु वाटिका के संकल्पना क्रियाकलापों के प्रकार शिशु वाटिका के कार्यक्रम शैक्षिक व्यवस्थायें साधन सामग्री एवं उनका संस्कार पक्ष का विस्तृत परिचय दिया जाना चाहिए।
बालिका शिक्षा
बालिका शिक्षा
बालिका शिक्षा 40 वर्षों से निरन्तर प्रगति पर है प्रान्त स्तर से क्षेत्र स्तर तक टीम का गठन
हो गया है। अधिकांष जिलों में ग्रामीण एवं शहरी विद्यालयों के संयोजक हैं शेष जिलों में बना लिया
जायेगा। क्षेत्र स्तर 28 स्वतंत्र बालिका विद्यालय हैं शेष सह शिक्षा के विद्यालय हैं। बालिका शिक्षा की
कार्ययोजना एवं पाठ्यक्रम अनुसार गतिविधियाँ सम्पन्न होती हैं। सह शिक्षा विद्यालयों में समन्वय
करने की आवष्यकता है। कार्य को गति देने में कठिनाई होती है।
- समय-समय पर प्रशिक्षण वर्गों का आयोजन किया जाता है। सतत् पूँछ- तॉछ प्रान्त प्रमुखों
द्वारा होती रहती है।
- वृत्त संकलन की व्यवस्था बनाई जानी है। कार्य का तुलनात्मक अध्ययन करने की
आवष्यकता है।
- बालिका विद्यालयों में बालिका शिक्षा परिषद का गठन हो रहा है, आंकडा एकत्र करना है।
बालिका शिक्षा योजना एवं क्रियान्वयन –
- योजनानुसार बालिका शिक्षा का आयोजन दो दिवसीय होता है। पाठ्यक्रम के अनुसार
गतिविधियाँ चलती हैं।
- वर्ष में एक बार क्षेत्र स्तर पर बैठकर विचार करते हैं।
- प्रान्त स्तर पर प्रशिक्षण की व्यवस्था है कार्यक्रमों का आयोजन कर सम्पन्न कराती है। नवीन
तकनीक का प्रयोग होता है।
वर्तमान चुनौतियाँ –
- लव जिहाद, स्वसुरक्षा जन्मोत्सव, कुटुम्ब प्रबोधन आदि पर विचार करते हैं।
- बालिकाओं के कैरियर सम्बन्धी कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।
- बालिकाओं में सप्तषक्तियों का विकास पर बल दिया जाता है।
बालिका शिक्षा के विस्तार –
- बालिका शिक्षा विषय क्रियान्वयन बालिका विद्यालयों एवं सहशिक्षा विद्यालय तक सीमिति है।
वर्तमान समय को देखते हुए इस विषय को व्यापक बनाने की आवष्यकता है।
- क्षेत्र के विस्तार की दृष्टि से अभिभावक, पूर्वछात्राओं समाज में चलने वाले अन्य विद्यालयों
को सम्मिलित करना चाहिए, यह गतिविधियाँ हों।
- परिवार प्रबोधन दादा- दादी सम्मेलन करना।
- किशोरी युक्ति सम्मेलन करना।
- बालिका शिक्षा के विषय को पूर्ण कालिक कार्यकर्ताओं के मध्य जाना चाहिए।
पंचकोषात्क बालिका शिक्षा का स्वरूप –
- बालिका शिक्षा के पाठ्यक्रम को पाँच कोशो के आाधार पर पाठ्यक्रम की रचना हो।
- इन्हीं स्तरों के आधार पर गतिविधियाँ की जाएं।
आदर्श बालिका शिक्षा विद्यालय –
- विद्यालयों का अवलोकन कर सूची बनाना।
- भूमि- भवन संसाधनों का विकास करना।
- विद्यालय की आवष्यकतानुसार पुस्तकालय,वाचनालय, प्रयोगशालाओं का विकास करना।
- बालिकाओं की आदर्श जीवन चर्या।
- बालिकाओं का उचित आहार- विहार।
- किशोरावस्था में मनोविज्ञान जानना।
- किशोरियों का व्यायाम और योग।
- प्रबन्ध कौशल का विकास करना।
- सामाजिक दायित्यों का बोध कराना।
आगामी योजना-
- वर्ष में क्षेत्र स्तर पर बैठकर योजना करना।
- प्रान्त स्तर पर एक प्रभावी कार्यक्रम का आयोजन करना।
- सरस्वती यात्रा के माध्यम से जन चेतना का जागृत करना।
- किशोर शिविर एवं बालमेला का आयोजन करना।
- बालिकाओं का विद्यालय स्तर पर प्रबोधन करना।
- माता- पुत्री गोष्ठी का आयोजन करना।
Preparatory स्तर की शिक्षा (प्राथमिक शिक्षा)
प्राथमिक शिक्षा (प्रिपरेटरी ग्रुप)
- प्राथमिक शिक्षा हमारे कार्य का आधार सुदृढ़ नींव ही नहीं, अपितु हम सब का संकल्प और कर्तव्य। हमारी संकल्पना प्राथमिक शिक्षा कैसे गुणवत्ता प्रधान, सौंदर्य प्रधान, चिन्तन प्रधान बनें तथा संस्कारक्षम वातावरण के साथ-साथ शैक्षिक परिवर्तन-परिवर्धन बढ़े । इस हेतु प्राथमिक शिक्षा के वर्गों का आयोजन NCERT की एक रिपोर्ट के आधार पर-
- प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता घट रही है।
- अभिभावकों का विद्यालयों से विश्वास घट रहा है। ऐसी रिपोर्ट आने पर विद्या भारती ने प्राथमिक शिक्षा में विचार विमर्श (व्यवस्था सुधार) हेतु बैठकें की गईं। जिनमें सबसे पहले 2014 बरेली में, 2015 गोरखपुर में, 2016 मथुरा मे 2017 रायपुर में, 2018 कटक में तथा 2019 औरंगाबाद में प्राथमिक शिक्षा में गुणवत्ता कैसे बढ़े, इस हेतु क्षेत्रीय व प्रान्तीय टोली की बैठक करके विचार विमर्श कर लागू करने का निर्देश दिया गया।
- प्राथमिक शिक्षा भारतीयता भारतीय संस्कृति व भारतीय संस्कारों से ओत-प्रोत हो। विद्यालयों का वातावरण परिवेश संस्कारक्षम बने इस हेतु प्रयास किया जाये।
- प्राथमिक शिक्षा में शिक्षण में सहायक सामग्री का प्रदर्शन करके अपने सभी शैक्षिक विषयों का प्रतिपादन करने पर बल दिया जाये। विषय प्रमुखों का प्रशिक्षण पंचपदी विधि से शिक्षण, सुलेख एवं शुद्ध लेख पर प्रारम्भ से ही बल दिया जाय। गतिविधि आधारित पाठ्यक्रम तैयार कर बालकों में मनोसामाजिक वातावरण, शैक्षिक व्यवस्था, सांस्कृतिक कार्यक्रम समाज सेवा आदि विषयों के साथ-साथ क्रियाकलापों में बालकों की सहभागिता अधिकाधिक हो इस हेतु प्रत्येक प्रान्त में, प्रान्त संयोजक, सह संयोजक के साथ-साथ क्षेत्रीय टोली की बैठकों का आयोजन उनमे शैक्षिक व्यवस्था के सुधार पर निश्चित बिन्दु प्रत्येक विद्यालय तक बिन्दु पहुँचें और उनका क्रियान्वयन हो सके। इस हेतु प्राथमिक शिक्षा की प्रांतीय परिषद के साथ-साथ प्राथमिक शिक्षा के जिला प्रमुख व विद्यालय में प्राथमिक शिक्षा के विद्यालय प्रमुख निश्चित किये गये। समय-समय पर उनकी बैठकें भी आयोजित की जाती हैं। प्रतिवर्ष अखिल भारतीय स्तर पर बैठक तत्पश्चात क्षेत्रीय टोली व प्रांत संयोजकों की बैठकों का आयोजन शैक्षिक सुधार हेतु किया जा रहा है।
- संकुलशः आचार्यों का विषयशः प्रशिक्षण वर्ग नियमित रूप से किया जा रहा है।
- पंचपदी आधार पर शिक्षण हेतु प्रशिक्षण।
- आचार्यों का मासान्त पर दक्षता वर्ग के रूप में प्रशिक्षण वर्ग का आयोजन।
- अपने क्षेत्र की प्राथमिक शिक्षा की बैठकें सुल्तानपुर, कर्वी (चित्रकूट), बलिया, लखीमपुर में बैठकों का आयोजन किया गया। समय-समय पर संयोजक अपने प्रांत के विद्यालयों का प्रवास करते हैं। प्रत्येक प्रांत में पंचपदी शिक्षण हेतु दस-दस विद्यालयों का चयन किया गया। जिनमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप शिक्षण कार्य किया जा रहा है। फलस्वरूप प्राथमिक शिक्षा का समाज में मांग बढ़ रही है। सत्र 2024-2025 मे क्षेत्रीय टोली की बैठक सरस्वती शिशु मन्दिर सिरवारा मार्ग में की गयी।
Middle स्तर की शिक्षा (पूर्व माध्यमिक शिक्षा)
Secondary स्तर की शिक्षा (उच्च माध्यमिक शिक्षा)
गुणवत्ता विकास के विषय
प्रशिक्षण
मानक परिषद
अटल टिंकरिंग लैब (ATL)
विशेष क्षेत्र की शिक्षा
शिक्षा एवं ग्राम विकास
शिक्षा एवं ग्राम विकास
देश की 80 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामों में निवास करती है। इसलिए गॉवों का समुचित एवं समग्र विकास होने से ही अपना देश भारत पूर्ण विकसित राष्ट्र बन सकता है इसी को ध्यान में रखकर 1986 में श्रद्धेय भाऊराव देवरस जी तत्कालीन विद्या भारती के संरक्षक के मार्ग दर्शन में ग्रामीण क्षेत्र की शिक्षा प्रारम्भ की गयी चूकि पाठ्यक्रम एवं पाठ्यपुस्तकें तो वही थी जो नगरीय विद्यालयों में थीइस लिए शिक्षा के साथ-ंउचयसाथ सम्पर्कित गॉवों का विकास विद्यालय के माध्यम से हो सके इस हेतु ग्रामीण क्षेत्र की शिक्षा के 6 आयाम निश्चित किये गये जो इस प्रकार से हैं।
1 – साक्षरता, 2 – स्वच्छता/स्वास्थ्य, 3 – समरसता, 4 – संस्कृति, 5 – स्वदेशी , 6 – स्वालम्वन
अर्थात आज भी गॉवों बहुत से लोग अनपढ़ हैं जैसे पढ़-लिख नहीं सकते या अपना हस्ताक्षर भी नहीं कर सकते तो ऐसे लोगों के बीच अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र चलाकर उन्हें कुछ पढ़ना-लिखना या हस्ताक्षर कर सकने योग्य बनाने की व्यवस्था ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालययों के माध्यम से की जाती है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाने हेतु विद्यालयों के माध्यम से स्वास्थ्य गोष्ठी, शिविर, स्वच्छता अभियान आदि चलाकर ग्रामीणों को जागरूक बनाने का कार्य चलाया जाता है। आज भी देश में कहीं-कहीं छूत-अछूत का भेद-भाव सामने आ ही जाता है जो समाज संरचना को बिगाड़ देता है उसके उन्मूलन हेतु समरसता के कार्यक्रम विभिन्न अवसरों पर चलाये जाते हैं जैसे – मकर संक्रान्ति पर सहभोज (खिचड़ी-भोज) कार्यक्रम, पर्व, जयन्ती एवं उत्सवों को सेवा बस्ती में जाकर मनाना या सेवा बस्ती के लोगों को अपने यहॉं बुलाने का कार्यक्रम । आज टेलीविजन या अन्य प्रचार माध्यमों से देश के ग्रामीण दूर-दराज के श्लोकों में भी प्रतिकूल आचरण युक्त कार्यक्रमों का आयोजन सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से होने लगा है ,खान-पान, रहन-सहन, नाते–रिश्ते, पहनावा एवं अन्य व्यवस्थायें पाश्चत्य संस्कृति के हिसाब से लोग मना रहे हैं, अपनी भारतीय संस्कृति को नष्ट करने का कुलित प्रयास किया जा रहा र्है। इसके लिए विद्यालय के माध्यम से समाज में जागरूकता लाने हेतु अनेक कार्यक्रमों की रचना की जाती है एवं लागों को भरतीय वेश-भूषा, खान-पान ,रहन-सहन अथवा पर्व जयन्ती, उत्सव मनाने के भारतीय संस्कृति का आधार देने हेतु अभियान चलाया जाता है या इस हेतु विभिन्न कार्यक्रमों की रचना की जाती है। स्व के बोध हेतु स्वदेशी अभियान या स्वदेशी अभियान या स्वदेशी पखवाड़ा पंडित दीन दयाल उपाध्याय की जयन्ती पर मनाया जाता है, वेश, भाषा, भ्रमण, भवन, भूषण, स्वदेशी के हो और स्वदेशी सामानों का उपयोग घरों में किया जाय इस हेतु कार्यक्रम किया जाता है। आज गॉवों से युवाओं का पलायन बहुत तेजी के साथ हो रहा है क्योंकि गॉवों में रोजगार की कमी है, कृषि लाभकारी नहीं रह गयी है। बिजली, चिकित्सा, अच्छे विद्यालयों का अभाव है इसलिए विद्यालयों के माध्यम से स्व रोजगार हेतु, जैविक कृषि, गोपालन, फलसंरक्षण, अचार, मुरब्बा बनाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है जिससे गॉवों में भी रोजगार के अवसर बढ़े और मेरा गॉव मेरा तीर्थ ऐसा अभियान चलाया जाता है। 2022 की अखिल भारतीय साधारण सभा की बैठक में इसी ग्रामीण क्षेत्र की शिक्षा का नाम परिपर्तित कर (शिक्षा एवं ग्राम विकास) कर दिया गया क्योंकि वास्तव में ये छः आयाम ग्राम विकास हेतु ही हैं। केवल ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों में ही नहीं अपितु नगरीय विद्यालयों में भी इसे लागू करना आवश्यक हो गया है क्योंकि नगरीय विद्यालयों में भी 50% से अधिक बच्चे गॉवों से ही आते हैं। उनके माध्यम से ग्राम विकास का कार्य किया जा सकता है। विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश में शिक्षा एवं ग्राम विकास का क्रियान्वयन अब धीरे-धीरे सभी समितियों में करने का प्रयास किया जा रहा है इस हेतु आगामी योजना इस प्रकार है।
1 – सभी प्रान्तों में शिक्षा एवं ग्राम विकास प्रमुख बनाना।
2 – सभी समितियों में छः आयामों के प्रमुख/संयोजक बनाना।
3 – सभी विद्यालयों में भी शिक्षा एवं ग्राम विकास प्रमुख बनाना।
4 – क्रियान्वयन के विन्दु निश्चित करना एवं उसका क्रियान्वयन करना।
5 – किये गये कार्यों की समीक्षा करना ।
जन जातीय क्षेत्र की शिक्षा
सेवा क्षेत्र की शिक्षा
सेवा क्षेत्र की शिक्षा
सेवा कार्य की संकल्पना एवं उद्देश्य –
सन् 1981 में श्रद्धेय भाऊराव देवरस ने झारखंड के घोर बनांचल क्षेत्र में गुमला नामक स्थान पर वनवासी सेवा में लगे सेवा कार्यकर्ताओं के बीच में अनौपचारिक शिक्षण पद्धति पर अधारित एकल शिक्षक विद्यालय योजना की कल्पना दी। उनकी प्रेरणा से यह संकल्प उभर कर आया कि देश के अन्तिम व्यक्ति तक शिक्षा के दीप का प्रकाश पहुचाकर इनकी सोच को देश के मुख्यधारा जोडना अत्यन्त आवश्यक है। ऐसा भी अनुभव में आया कि विश्व के सभी देशों में साक्षरता हेतु औपचारिक विद्यालयों की तुलना में अनौपचारिक शिक्षा केन्द्रो को ही अधिक उपयोगी पाया गया है।
एक चुनौतीपूर्ण कार्यक्षेत्र
दुर्भाग्यवश दासता के कालखंड मे ये स्वस्थ परम्पराएं लुप्त हो गयी। झुग्गी -झोपड़ी, सुदूर ग्रामीण और बनांचलों मे रहने वाला बहुत बड़ा वर्ग हमारी उपेक्षा व तिरस्कार के कारण देश के मुख्य धारा से दूर होता चला गया। आज अपने देश में ऐसे अभावग्रस्त बन्धुओं की चार श्रेणियों सर्वत्र देखी जा सकतीं है-
क- श्रमिक क्षेत्र – रेलवे स्टेशन पर, बस स्टाफ पर, रिक्शा चलाने वाले, मजदूरी करने वाले, ठेला खीचने वाले,गोदाम से बोरी उतरने वाले।
ख- सेवा बस्ती यानि अछूत कहे जाने वाले समाज, ये हमारे घरों की गंदगी साफ करते हैं। चमड़े का जूता बनाकर लोगो को पहनाते है। इन्हें अछूत माना जाता है।
ग- वनवासी समाज इस देश में बहुत बड़ी संख्या वनवासियों की है। ये सब हिन्दू है वनों में रहते हैं। भूमि व प्रकृति को ये अपनी सम्पति मानते हैं।
घ- घुमन्तु समाज भैस पर इनका घर होता है ये अपनो को महाराणा प्रताप के बंशज बताते हैं। उनकी रक्षा का संकल्प लिया था उन्होंने। इस समाज की भी हम ने बहुत उपेक्षा की है।
संकल्प व समाधान विद्या भारती द्वारा सामाजिक समरसता तथा न्याय, राष्टीयता एकता और अखण्डता का वातावरण निर्माण करने हेतु निशुल्क या अल्प शुल्क पर सरस्वती संस्कार केन्द्र/ एकल शिक्षक विद्यालय चलाने का संकल्प लिया गया है। विद्यालयों के द्वारा संचालित सरस्वती संस्कार व एकल शिक्षक विद्यालय जहाँ आवश्यक है वहा पर चलना है। शताब्दी वर्ष में एक विद्यालय अनेक सरस्वती संस्कार केन्द्र चलाने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
सेवा क्षेत्र की शिक्षा अनौपचारिक शिक्षा के अंतर्गत आती है जिसमें 923 संस्कार केन्द्र, 41 पूर्ण विद्यालय, 96 एकल विद्यालय, 04 औषधि केन्द्र, 07 सिलाई प्रशिक्षण केन्द्र तथा 04 गोसंवर्धन केन्द्र संचालित किये जाते है |
वैशिष्टय के विषय
वैदिक गणित
विज्ञान
भैया-बहनों को विज्ञान के क्षेत्र में प्राचीन एवं अर्वाचीन उपलब्धियों से अवगत कराते हुए उनमें क्रिया आधारित अध्ययन, अवलोकन, अन्वेषन एवं संश्लेषण प्रवृति का विकास करना एवं वैज्ञानिक नवाचार को प्रोत्साहित करना है।
* विद्यार्थियो में वैज्ञानिक प्रतिभा विकसित करने का अवसर प्रदान करने के लिए।
* विज्ञान का समाज के विकास के साथ सम्बन्ध को बच्चों के ध्यान में लाने तथा उन्हें यह अनुभव करवाने के लिए कि वे कल के वैज्ञानिक हैं।
* बच्चों में उनके द्वारा तैयार किये जाने वाले प्रदर्शों के माध्यम से रचनात्मक उन्वेषण एवं संश्लेषण की छमता विकसित करने के लिए।
* बच्चों में चुनौतियों का हल ढूंढने की प्रवृति का विकास करना। विशेष रूप से ग्रामीण विकास की दृष्टि से तथा दैनिक जीवन के विकास में विज्ञान एवं तकनीकी के प्रयोग की दृष्टि से।
* कक्षा-कक्ष में विज्ञान के शिक्षण को प्रभावी बनाने के उद्येश्य से।
* सर्वसाधारण समाज में विज्ञान एवं वैज्ञानिक सोच को लोकप्रिय करने के लिए।
* विज्ञान के क्षेत्र में भारत की प्राचीन एवं अर्वाचीन महान उपलब्धियों की जानकारी बच्चों तक पहुँचाते हुए उनमें अपने देश को उन्नत बनाने का संकल्प जागृत करने के लिए।
* बच्चों को भारत की गौरवशाली संस्कृति का ज्ञान करवाने के उद्येश्य से।
उपरोक्त की दृष्टि से प्रतिवर्ष संकुल स्तर से लेकर अखिल भारतीय स्तर तक विज्ञान प्रश्न मंच, विज्ञान प्रयोग, विज्ञान प्रदर्श, विज्ञान पत्र प्रस्तुति एवं आचार्य पत्र प्रस्तुति जैसे कार्यक्रम सम्पादित किये जाते हैं।
विज्ञान
कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण, सामाजिक समरसता
खेलकूद परिषद
प्राथमिक शिक्षा (प्रिपरेटरी ग्रुप)
- प्राथमिक शिक्षा हमारे कार्य का आधार सुदृढ़ नींव ही नहीं, अपितु हम सब का संकल्प और कर्तव्य। हमारी संकल्पना प्राथमिक शिक्षा कैसे गुणवत्ता प्रधान, सौंदर्य प्रधान, चिन्तन प्रधान बनें तथा संस्कारक्षम वातावरण के साथ-साथ शैक्षिक परिवर्तन-परिवर्धन बढ़े । इस हेतु प्राथमिक शिक्षा के वर्गों का आयोजन NCERT की एक रिपोर्ट के आधार पर-
- प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता घट रही है।
- अभिभावकों का विद्यालयों से विश्वास घट रहा है। ऐसी रिपोर्ट आने पर विद्या भारती ने प्राथमिक शिक्षा में विचार विमर्श (व्यवस्था सुधार) हेतु बैठकें की गईं। जिनमें सबसे पहले 2014 बरेली में, 2015 गोरखपुर में, 2016 मथुरा मे 2017 रायपुर में, 2018 कटक में तथा 2019 औरंगाबाद में प्राथमिक शिक्षा में गुणवत्ता कैसे बढ़े, इस हेतु क्षेत्रीय व प्रान्तीय टोली की बैठक करके विचार विमर्श कर लागू करने का निर्देश दिया गया।
- प्राथमिक शिक्षा भारतीयता भारतीय संस्कृति व भारतीय संस्कारों से ओत-प्रोत हो। विद्यालयों का वातावरण परिवेश संस्कारक्षम बने इस हेतु प्रयास किया जाये।
- प्राथमिक शिक्षा में शिक्षण में सहायक सामग्री का प्रदर्शन करके अपने सभी शैक्षिक विषयों का प्रतिपादन करने पर बल दिया जाये। विषय प्रमुखों का प्रशिक्षण पंचपदी विधि से शिक्षण, सुलेख एवं शुद्ध लेख पर प्रारम्भ से ही बल दिया जाय। गतिविधि आधारित पाठ्यक्रम तैयार कर बालकों में मनोसामाजिक वातावरण, शैक्षिक व्यवस्था, सांस्कृतिक कार्यक्रम समाज सेवा आदि विषयों के साथ-साथ क्रियाकलापों में बालकों की सहभागिता अधिकाधिक हो इस हेतु प्रत्येक प्रान्त में, प्रान्त संयोजक, सह संयोजक के साथ-साथ क्षेत्रीय टोली की बैठकों का आयोजन उनमे शैक्षिक व्यवस्था के सुधार पर निश्चित बिन्दु प्रत्येक विद्यालय तक बिन्दु पहुँचें और उनका क्रियान्वयन हो सके। इस हेतु प्राथमिक शिक्षा की प्रांतीय परिषद के साथ-साथ प्राथमिक शिक्षा के जिला प्रमुख व विद्यालय में प्राथमिक शिक्षा के विद्यालय प्रमुख निश्चित किये गये। समय-समय पर उनकी बैठकें भी आयोजित की जाती हैं। प्रतिवर्ष अखिल भारतीय स्तर पर बैठक तत्पश्चात क्षेत्रीय टोली व प्रांत संयोजकों की बैठकों का आयोजन शैक्षिक सुधार हेतु किया जा रहा है।
- संकुलशः आचार्यों का विषयशः प्रशिक्षण वर्ग नियमित रूप से किया जा रहा है।
- पंचपदी आधार पर शिक्षण हेतु प्रशिक्षण।
- आचार्यों का मासान्त पर दक्षता वर्ग के रूप में प्रशिक्षण वर्ग का आयोजन।
- अपने क्षेत्र की प्राथमिक शिक्षा की बैठकें सुल्तानपुर, कर्वी (चित्रकूट), बलिया, लखीमपुर में बैठकों का आयोजन किया गया। समय-समय पर संयोजक अपने प्रांत के विद्यालयों का प्रवास करते हैं। प्रत्येक प्रांत में पंचपदी शिक्षण हेतु दस-दस विद्यालयों का चयन किया गया। जिनमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप शिक्षण कार्य किया जा रहा है। फलस्वरूप प्राथमिक शिक्षा का समाज में मांग बढ़ रही है। सत्र 2024-2025 मे क्षेत्रीय टोली की बैठक सरस्वती शिशु मन्दिर सिरवारा मार्ग में की गयी।
