राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक परमपूज्यनीय माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर गुरूजी ने भारतीय वातावरण के अनुकूल संस्कारक्षम शिक्षण पद्धति विकसित करने का विचार किया। इस हेतु 1952 में, संघ प्रेरणा से कुछ निष्ठावान लोग इस पुनीत कार्य में जुट गए, राष्ट्र निर्माण के इस कार्य में लगे लोगों ने नवोदित पीढ़ी को सुयोग्य शिक्षा और शिक्षा के साथ संस्कार देने के लिए “सरस्वती शिशु मंदिर” की आधारशिला पक्कीबाग़ गोरखपुर में पांच रुपये मासिक किराये के भवन में प्रथम शिशु मंदिर की स्थापना से श्रीगणेश किया | इससे पूर्व कुरुक्षेत्र में गीता विद्यालय की स्थापना 1946 में हो चुकी थी, मन की आस्था, ह्रदय का विकास, निश्चय की अडिगता तथा कल्पित स्वप्न को मन में लेकर कार्यकर्ताओं के द्वारा अपने विद्यालयों का नाम, विचार कर “सरस्वती शिशु मंदिर” रखा गया, उन्हीं की साधना, तपस्या, परिश्रम व संबल के परिणामस्वरुप स्थान-स्थान पर “सरस्वती शिशु मंदिर” स्थापित होने लगे| उत्तर प्रदेश में शिशु मंदिरों के संख्या तीव्र गति से बढ़ने लगी. इनके मार्गदर्शन एवं समुचित विकास के लिए 1958 में शिशु शिक्षा प्रबंध समिति नाम से प्रदेश समिति का गठन किया गया| सरस्वती शिशु मंदिरों को सुशिक्षा एवं सद्संस्कारों के केन्द्रों के रूप में समाज में प्रतिष्ठा एवं लोकप्रियता प्राप्त होने लगी,इसी प्रयत्न ने 1977 में अखिल भारतीय स्वरुप लिया और विद्या भारती संस्था का प्रादुर्भाव हुआ|

विद्या भारती - देश का सबसे बड़ा गैर सरकारी शिक्षा संगठन

आज नगरों और ग्रामों में, वनवासी और पर्वतीय क्षेत्रो में झुग्गी-झोपड़ियो में, शिशु वाटिकायें, शिशु मन्दिर, विद्या मन्दिर, सरस्वती विद्यालय, उच्चतर शिक्षा संस्थान, प्रशिक्षण केन्द्र और शोध संस्थान है। इन सरस्वती मन्दिरों की संख्या, विद्यालयों में छात्रो की संख्या और आचार्यो की संख्या निरन्तर बढ़ रही हैं। इसके फलस्वरूप अभिभावको के साथ तथा हिन्दु समाज में निरन्तर सम्पर्क बढ़ रहा है। हिन्दु समाज के हर क्षेत्र में प्रभाव बढ़ा है। आज विद्या भारती भारत में सबसे बड़ा गैर सरकारी शिक्षा संगठन बन चुका हैं।

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