या कुन्देन्दु तुषार हार धवला या शुभ्र वस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना |
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥ १ ॥
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।
हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ॥ २ ॥
हे हंसवाहिनी, ज्ञान दायिनी
अम्ब विमल मति दे,
अम्ब विमल मति दे ||
जग सिरमौर बनाएँ भारत,
वह बल विक्रम दे,
वह बल विक्रम दे॥
हे हंसवाहिनी, ज्ञान दायिनी
अम्ब विमल मति दे,
अम्ब विमल मति दे ||
साहस शील हृदय में भर दे,
जीवन त्याग-तपोमर कर दे,
संयम सत्य स्नेह का वर दे ||
स्वाभिमान भर दे,
स्वाभिमान भर दे ||
हे हंसवाहिनी, ज्ञान दायिनी
अम्ब विमल मति दे,
अम्ब विमल मति दे ||
लव-कुश, ध्रुव, प्रहलाद बनें हम
मानवता का त्रास हरें हम,
सीता, सावित्री, दुर्गा मां |
फिर घर-घर भर दे,
फिर घर-घर भर दे ||
हे हंसवाहिनी, ज्ञान दायिनी
अम्ब विमल मति दे,
अम्ब विमल मति दे ||
विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश भारतीय संस्कृति एवं राष्ट्रवाद पर आधारित शिक्षा प्रणाली का प्रमुख संस्थान है। इसकी नींव 1952 में गोरखपुर के पक्कीबाग़ में पहले “सरस्वती शिशु मंदिर” के रूप में रखी गई, जो संस्कारयुक्त शिक्षा प्रदान करने का केंद्र बना। 1958 में शिशु शिक्षा प्रबंध समिति का गठन हुआ, और 1977 में इसे अखिल भारतीय पहचान मिली, जिससे विद्या भारती देश का सबसे बड़ा गैर-सरकारी शिक्षा संगठन बन गया। यह संगठन राष्ट्रवादी शिक्षा, संस्कार, योग, संगीत, और चरित्र निर्माण को प्राथमिकता देता है। विद्या भारती भारतीय शिक्षा दर्शन को समृद्ध करने के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान और तकनीकी शिक्षा को भी बढ़ावा देती है।
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