राष्ट्र निर्माण में आचार्यों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। आचार्य ही वह दीपक हैं जो चरित्र और संस्कार का उजियारा फैलाते हैं। इसी भावना के साथ विद्या भारती के पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के सह संगठन मंत्री श्री राम मनोहर जी ने रघुवर प्रसाद जायसवाल सरस्वती शिशु मंदिर इंटर कॉलेज, तेतरी बाजार में आयोजित दस दिवसीय आचार्य प्रशिक्षण वर्ग के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि “निरंतर अध्ययनशील रहना एक आचार्य की असली पहचान है। जो शिक्षक हर क्षण कुछ नया सीखता है, वही राष्ट्र निर्माण का आधार बनता है।”
आगे उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षा मात्र आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन और चरित्र निर्माण का सर्वोच्च माध्यम होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “हम ईश्वर के एजेंट हैं, न कि एलआईसी के। हमारा कर्म पद या लाभ के लिए नहीं, बल्कि भावी पीढ़ी को संस्कारित करने के लिए है।”
उन्होंने समाज में बढ़ती भौतिकता की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि सोच केवल भौतिक सुखों तक सीमित रह जाएगी तो पारिवारिक और सामाजिक मूल्य नष्ट हो जाएंगे। “संस्कार कोई वस्तु नहीं जिसे खरीदा जा सके, यह आचरण और व्यवहार से उपजते हैं। बच्चे हमारे व्यवहार का प्रतिबिंब होते हैं।”
डिजिटल माध्यमों के सीमित प्रभाव पर बोलते हुए उन्होंने कहा, “टीवी ज्ञान तो दे सकता है, लेकिन संवेदना नहीं। शिक्षा भावनाओं के साथ एक आचार्य ही दे सकता है।”
श्री राम मनोहर जी ने जोर देते हुए कहा कि विद्या भारती का लक्ष्य पूरी तरह से आचार्यों के मन में बसा होना चाहिए। जब लक्ष्य स्पष्ट होगा तभी हम सही दिशा में कार्य कर सकेंगे। “एक आचार्य की पहचान उसके पद से नहीं, बल्कि उसके जीवन के आचरण और समर्पण से होती है।”
इस अवसर पर प्रदेश निरीक्षक श्री राम सिंह जी ने मंचासीन अतिथियों का परिचय कराया। कार्यक्रम में संभाग निरीक्षक श्री कन्हैया चौबे, संस्कृति बोध परियोजना के प्रांत संयोजक श्री दिवाकर जी, विद्यालय प्रबंध समिति अध्यक्ष श्री मुरलीधर अग्रहरि, तथा प्रधानाचार्य डॉ. राजेश कुमार श्रीवास्तव सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।















