
“मां और मातृभूमि की पवित्र भावना ही विद्या भारती का संस्कार है” — डॉ. सौरभ मालवीय

विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान से सम्बद्ध काशी प्रांत द्वारा आयोजित शिशु वाटिका प्रशिक्षण वर्ग एवं नव चयनित आचार्य प्रशिक्षण वर्ग का समापन सत्र गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ।

कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती एवं भारत माता के चित्र पर दीप प्रज्ज्वलन एवं पुष्पार्चन के साथ हुआ। इस अवसर पर डॉ. सौरभ मालवीय (क्षेत्रीय मंत्री), अनुग्रह नारायण मिश्र (सह क्षेत्रीय मंत्री) एवं राजबहादुर दीक्षित (प्रदेश निरीक्षक) उपस्थित रहे।

कार्यक्रम में अतिथि परिचय (पुष्पांजलि दीदी), वृत्त निवेदन (मीरा पाठक), एकल गीत (निशा दीदी) एवं अनुभव कथन (ज्योति सिंह) द्वारा भावपूर्ण प्रस्तुतियाँ दी गईं।

इस प्रशिक्षण वर्ग में शिशु वाटिका की 74 बहनों तथा नव चयनित वर्ग के 46 भैया-बहनों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। आयोजित परीक्षा में पूनम सिंह (प्रथम), भरत शर्मा (द्वितीय) एवं दीक्षा राय (तृतीय) स्थान प्राप्त कर सम्मानित हुए।

संस्कारों का मूल – मां और मातृभूमि
अपने उद्बोधन में डॉ. मालवीय ने कहा कि शिशु का पहला संबंध ‘मां’ से होता है और यही भाव आगे चलकर राष्ट्रभक्ति एवं समाज सेवा का आधार बनता है।
उन्होंने भारतीय संस्कृति के मूल मंत्र “वसुधैव कुटुम्बकम्” को स्मरण कराते हुए कहा कि भारत सत्य, शिव और सुंदर की भूमि है, जहां अतिथि देवो भवः एवं माता-पिता का सर्वोच्च सम्मान हमारी पहचान है।

उन्होंने कहा—
“अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥”

शिक्षा ही सबसे बड़ी सेवा
उन्होंने कहा कि शिक्षा ही राष्ट्र निर्माण का सबसे प्रभावी माध्यम है और संस्कारयुक्त शिक्षा के माध्यम से ही सशक्त भारत का निर्माण संभव है।

आभार एवं समापन
अनुग्रह नारायण मिश्र जी ने सभी कार्यकर्ताओं, अधिकारियों एवं व्यवस्थाओं में लगे सहयोगियों का आभार व्यक्त किया।

कार्यक्रम का समापन वंदे मातरम् के सस्वर गायन के साथ हुआ।

संस्कार, समर्पण और राष्ट्रभाव—यही विद्या भारती की पहचान है।
